मगधी ज़ोन से बाँधवगढ़ किले का विशालकाय पिछला हिस्सा दिखता है , जिसे देखकर आपके सामने राजा महाराजों का विशाल साम्राज्य , उनकी शानो - शौकत विशाल जंगल और उनकी बहादुरी का पराक्रम दिखाने के लिए इन निर्दोष वन्य जीवों की बलियाँ । यह सोच आपके शरीर में एक सिहरन पैदा कर देगी ।
आज की यात्रा में लौटते समय दो सियार तेजी से जंगल में अंदर की तरफ बढ़ रहे थे । उनका रोल सफाईकर्मी का बताया गया । जब जंगल में शिकार खाने के बाद टाइगर उन्हें छोड़ देते हैं तो सियार उसको पूरी तरह साफ कर देते हैं जिससे उनका पेट भी भर जाता है और इकोसिस्टम में गंदगी और बदबू भी नहीं फैलती है।
पहले दिन टाईगर दर्शन ना होने की निराशा सबके चेहरे पर थी । लौटकर वापिस मगधी गेट पहुँचने पर गाइड ने एक संदेश दिखाया :-
“निराश ना हों शायद मुझे नहीं देख पाए
परंतु मैंने आपको देखा है।“
सच्चा , स्वाभाविक और मार्मिक संदेश ऊर्जा से भरा हुआ । टिकट काउन्टर पहुँच कर हमने गाइड और ड्राइवर का धन्यवाद किया । बड़े भाई साहब ने अगले दिन के टिकट की प्रक्रिया शुरू की । एक अन्य संदेश जिसने मेरा ध्यान खींचा :-
“पार्क के अंदर जानवर कूड़ा नहीं फैलाते हैं । मनुष्य फैलाते हैं ।
कृपया जानवरों की तरह व्यवहार करें ।“
इसको पढ़कर लगा कि मनुष्य ने ही शिष्टाचार से अशिष्टता की यात्रा तय की है जबकि जानवर आज भी शायद अपना जीवन इसी परम्परा से निर्वाह कर रहे हैं । यात्रा पूर्ण करके हम अपने रिज़ॉर्ट की तरफ निकल गए । बड़े भाई साहब ने यह व्यवस्था की थी अतः पूरी निश्चिंतता थी । स्प्री माटी जंगल रिज़ॉर्ट गाँव में था जहां गूगल मैप भी हरी भैया को चकमा दे रहा था । रिज़ॉर्ट जंगल एवं गाँव की पृष्ठभूमि पर बना हुआ था परन्तु तमाम आधुनिक सुख सुविधाओं के साथ , जैसे एक बड़े कॉमन स्विमिंग पूल के अलावा हर कॉटेज के साथ एक खुला स्विमिंग पूल ।

रिज़ॉर्ट में आकर थोड़ा विश्राम कर एवं नहा धोकर खाने की टेबल पर बैठ गए , दाल रोटी व सब्जी का ताज़ा सात्विक भोजन खाकर दिल खुश हो गया । सुबह की कड़ाके की सर्दी को ध्यान में रखते हुये उनसे कंबल की मांग सुबह की सफारी के लिए की गई ताकि खुली जीप में सर्दी से बचा जा सके । भोजन उपरान्त अपने कमरे में आने के बाद बाहर आसमान का नजारा अद्भुत था । चारों तरफ एक खामोशी और घने काले आसमान में टिम टिम करते तारे जो दिल्ली में बहुत कम या नहीं के बराबर दिखते हैं। कभी कभी ऐसी दूरी ऐसी यात्रा आपको ताजगी के अलावा जिंदगी में झाँकने का मौका देती है। मै रिज़ॉर्ट के दरवाजे से लगभग १० बजे बाहर निकला और पास के तालाब को देखने लगा तो गार्ड ने आकर अंदर चलने को कहा क्योंकि रिज़ॉर्ट ताला ज़ोन से लगभग १ कम दूर है और गर्मियों में जंगली जानवर यदा-कदा तालाब में पानी पीने आ जाते हैं ।
अगले दिन सुबह जल्दी उठना था अतः रात्रि विश्राम का निर्णय लिया गया । अगले दो दिनों के अवकाश को ध्यान में रखते हुये रिज़ॉर्ट में यात्रियों की आवक बढ़ रही थी ।
१३ . १२ . २०२५ ( ताला ज़ोन)
रिज़ॉर्ट में रात्रि विश्राम के बाद सुबह सभी जल्दी उठ गए । हरी भैया बाहर चलने के लिए तैयार थे । सफारी के लिए एक-एक कम्बल उन्होंने हमें रात में ही दे दिए थे । सुबह का नाश्ता भी उन्होंने पैक करके गाड़ी में रखवा दिया था , चाय पीकर हम निकल गए और हरी भैया ने हमें टिकट काउन्टर तक छोड़ दिया । आज हमारी यात्रा ताला ज़ोन की थी और टाइगर दर्शन की इच्छा तीव्र हो रही थी क्योंकि इसके बाद हमारे पास एक दिन का समय और था । साथ ही अगले दिन रात्रि की वापसी की ट्रेन भी थी ।
इस ज़ोन की नैसर्गिक सुंदरता , बाँधवगढ़ फोर्ट , विष्णु भगवान की शेष शैय्या , पहाड़ी और मैदानी रास्ते , साथ ही टिकट काउन्टर पर पता चला कि इस ज़ोन में सबसे ज्यादा टाइगर साईट स्पॉट हैं । मन खुश था टाइगर दर्शन और इतिहास को और जानने की इच्छा से । ऐतिहासिक रूप से पता चला कि भगवान राम ने लंका विजय के उपरान्त किले का निर्माण कराकर उसे अपने भाई लक्ष्मण को दे दिया तभी इसका नाम बांधव + गढ़ = बाँधवगढ़ पड़ा ।
बाँधवगढ़ लगभग १५०० वर्ग किलोमीटर में फैला हुआ है और लगभग २००० वर्ष पुराना है । भिन्न भिन्न राजाओं ने इस पर समय समय पर शासन किया । विशाल वन क्षेत्र उस समय के अनुसार शानदार शिकारगाह थे क्योंकि यहाँ पर प्रकृति और वातावरण , जलवायु की वजह से वन्य जीवों की उपलब्धता प्रचुर मात्रा में थी । जगह-जगह बने हुये मचान अभी भी आपको यहाँ के इतिहास की गवाही देते मिलेंगे ।
सफारी जीप , जो खुली होती है , में हम परिवार के चार लोग ही थे , अन्यथा सामान्य तौर पर छह लोग होते हैं । सुबह की भयंकर सर्दी के अनुरूप हमने टोपी , मफ़लर , जैकिट , कंबल सब कुछ ओढ़ लिया ताकि खुली जीप में खुद को सुरक्षित रखा जा सके । टिकट काउन्टर से ताला गेट तक वन विभाग की छोटी सड़क पर चलते हुये हम ताला गेट प्रवेश मार्ग पर पहुंचे। गेट खुलने से पहले ही जीपों की कतार थी वैधानिक औपचारिकताओं के बाद हमने प्रवेश किया ।
सफारी जीप चलने के कुछ समय बाद ही ड्राइवर को कॉल मिल गई । हम लोग उसी दिशा में आशा के साथ बढ़ गए । कॉल साफ और ऊंची थी , साथ ही टाइगर की दहाड़ भी सुनाई दी थी , निःसन्देह अंदर टाइगर था । हम वहाँ इंतजार करने लगे । पंद्रह मिनट तक कशमकश के साथ इंतजार करने के बाद भी टाइगर बाहर नहीं आया और कॉल शान्त हो गई। ड्राइवर ने वहाँ से प्रस्थान करना उचित बोला और चल दिया क्योंकि स्टेयरिंग उसी के हाथ में था ।
टाइगर चार्जर और फ़ीमेल टाइगर सीता के सभी वंशज कहलाते हैं । वर्तमान में भीम का पुत्र बजरंग ताला ज़ोन का आकर्षण केंद्र है । ड्राइवर ने बताया कि बाँधवगढ़ किले में राम जानकी का मंदिर है जो जनता के लिए जन्माष्टमी और कबीर जयंती के दिन खुलता है । मुझे आश्चर्य हुआ कि राम-जानकी मंदिर जन्माष्टमी के दिन पूजा के लिए क्यों खुलता है। पता चला कि यहाँ पर राम जानकी को राधा कृष्ण के रूप में पूजा जाता है। बघेल राजाओं ने बाँधवगढ़ में सबसे ज्यादा समय तक शासन किया और उन्होंने ही इस मंदिर का निर्माण कराया । अभी यह मंदिर पर्यटकों के लिए नहीं खुला है ।
आगे चलने पर अद्भुत सूर्योदय का नजारा देखने को मिला , साथ ही विंध्याचल पर्वत की हरी भरी खूबसूरती का एहसास भी दिल को छू गया । ताला ज़ोन के रास्ते पथरीले , घुमावदार और थोड़े दुर्गम हैं । ड्राइवर भाई का साहस इन्हें आसान बना रहा था ।

इस यात्रा में जहाँ एक ओर दाहिनी तरफ ड्राइवर साहब तलाश करते हैं और बाईं तरफ गाइड दूर तक निगाह रखते हैं परन्तु यात्रियों को भी चारों तरफ नजर रखने के लिए बोला जाता है । यही कारण यात्रा को उत्सुकता और कौतूहल से भर देता है ।
अचानक भाई साहब को दूर एक तेंदुआ दिखाई दिया , जिसे हमने हलचल के आधार पर देखा । गाइड ने बताया कि तेंदुए की साइट थोड़ा मुश्किल होती है । परन्तु हमें यह संयोग मिला । जंगल में टाइगर अपना वन क्षेत्र निर्धारित कर लेते हैं और उसकी चौकसी करते रहते हैं । इनकी सूँघने की क्षमता अद्भुत होती है और इसी के आधार पर जब भी कोई दूसरा टाइगर इनके एरिया मे आकर अगर मूत्र त्याग कर गया होता है तो इन्हें पता चल जाता हैं कि कोई आया था ।
माना जाता है कि टाइगर जमीन पर खड़े होकर मुलायम पेड़ों पर , जहां तक उनका हाथ जाता है , अपने पंजों के निशान बना देते हैं और यह पंजों के निशान दूसरे टाइगर को चेलेंज देते हैं । दूसरा टाइगर पहले टाइगर से और ऊंचा निशान बनाते हैं जिससे इन्हें उसकी ताकत का अंदाजा होता है । यही चेलेंज जंगलों में इनकी प्रभुता की लड़ाई का कारण बनता है जो उनके एरिया को भी निर्धारित करता है । दूसरी तरफ , वैज्ञानिक आधार पर कहा जाता हैं कि टाइगर शिकार करने के बाद और उसे खाने के बाद अपने पंजे के नाखून पेड़ों पर साफ करते हैं ।
बाँधवगढ़ किले की तरफ जब आप चलते हैं तो रास्ते में भगवान विष्णु की शेषशय्या है , ड्राइवर का कहना था कि इस ओर भी टाइगर साइट होती हैं । लेकिन मैंने जब इस दृश्य को देखा तो यकायक मुझे अपनी दक्षिण भारत की यात्रा की याद आ गई । कन्याकुमारी की यात्रा के बाद आप जब वापसी में पद्मनाभन स्वामी मंदिर आते हैं तब आपको मंदिर में भगवान विष्णु के विश्राम अवस्था में दर्शन होते हैं , बिल्कुल श्याम और सलोने , चिरनिद्रा में लेटे हुये , साक्षात और अवर्णनीय , बहुत ही अलौकिक है वह दृश्य । मुझे वह मंदिर रामेश्वरम से भी ज्यादा दिल को छूने वाला लगा , अपनी यात्रा के आगामी चरणों में हम वहाँ भी चलेंगे ।

परन्तु बाँधवगढ़ में भगवान विष्णु शेषशय्या पर हैं । ड्राइवर ने बताया कि यह मूर्ति एक ही पत्थर से बनी हुई विशालकाय मूर्ति है जो लगभग १००० वर्ष से ज्यादा पुरानी है । लगता है कि मूर्तिकार ने, अपनी शानो-शौकत , अपने साम्राज्य के घमण्ड से चूर हो जाने पर राजा महाराजों को इस अंतिम शाश्वत सत्य से रूबरू करने के लिए , इसे पूरे मन से गढ़ा था । साथ ही यह मनुष्य , जीव जंतुओं और प्रकृति का अद्भुत एहसास कराता है जहां हिंसा , मोह , मद , प्रेम , वैराग्य सबसे दूर सबसे अलग क्षणिक एहसास है ।
कहा जाता है कि यहीं पर निरंतर जल धारा का स्रोत है जो प्रकृति ने सभी के लिए समान भाव से दिया है । यहीं चरण गंगा का उदगम स्रोत है जो आगे चलकर सोन नदी के बाद गंगा जी में विलीन हो जाती है। यह बाँधवगढ़ का अद्भुत नजारा है जहां सूर्य की किरणें इसको अत्यंत सुंदर बनाती हैं । यहाँ से आगे किले का रास्ता पर्यटकों के लिए खुला नहीं है ।
किले के रास्ते में ही हमें राजाओं द्वारा घोड़ों के लिए बनवाए हुये अस्तबल भी मिले जो यह दास्तान बयां करते हैं कि उस जमाने में जब ना कोई मोटर गाड़ी थी , ना कोई हेलिकाप्टर था , ना ऐसे संसाधन थे तब भी उन्होंने ऐसे किले कैसे बनवाए होंगे ।

यह ज़ोन बाँधवगढ़ के मनुष्य निर्मित इतिहास से भरा पड़ा है । साथ ही मनुष्य और जानवरों के संग-साथ का भी साक्षी है । आज भी टाइगर दर्शन ना होने की कसक मन में थी। परन्तु बांधवगढ़ के रास्ते और गलियां आज कुछ जाने पहचाने से लगे ।
१४.१२.२०२५ (खितौली ज़ोन )
आज यात्रा का अंतिम पड़ाव आ गया था। यह सच है कि जब आप जंगलों की यात्रा पर निकले हों तो किसी विशेष प्राणी मात्र की चाह करना अनुचित एवं भेदभाव पूर्ण हैं और जंगल की आबोहवा, वनस्पति, जलवायु और अन्य विद्यमान प्राणियों के साथ अन्याय भी । फिर भी दिल में कहीं एक यह चाह थी कि जिस टाइगर के लिए बाँधवगढ़ टाइगर रिजर्व जाना जाता है, वह चाह इस यात्रा में अधूरी ना रह जाये ।
सुबह उठने पर पता चला कि आसमान में थोड़ा कोहरा और ठण्ड ज्यादा थी। ऐसे में टाइगर की संभावना करना मुश्किल था वैसे भी खितौली में टाइगर स्पॉट कम ही हैं । सुबह मोबाईल के अलार्म से नींद खुली । स्प्री माटी जंगल (रिज़ॉर्ट )वालों ने कल की ही तरह नाश्ते (सेंडविच आदि) का सारा सामान टोकरी में रखकर गाड़ी में रखवा दिया था । सुबह की चाय, जिसकी आदत हम दोनों भाइयों को है और सर्दी की वजह से सब ने पी, लेकर रिज़ॉर्ट से प्रस्थान किया । हरी भैया ने हमें टिकट काउन्टर पर छोड़ दिया , जहां हमारे सफर के हमसफ़र दो अन्य साथी जंगल सफारी जीप में पहले से सवार थे। गाइड और दुर्गेश ने सीट संभाल ली। हमने परिचय के बाद पूछा कि खितौली में टाइगर साईट कैसी हैं, इतनी सर्दी में सुबह कैसा आलम रहता है । उन्होंने बताया कि कल भी सुबह के समय टाइगर साइट हुई थी ।
ईश्वर का नाम लेते हुये यात्रा आरंभ की, खितौली गेट पर आधार कार्ड से मिलान के बाद प्रवेश प्रारंभ हुआ । शुरुआत में दोनों तरफ आपको चीतल के समूह मिल जाएंगे । साथ में आपको हरे-भरे मैदान, तालाब और पानी के स्रोत मिल जाएंगे । कोहरे में सुबह-सुबह जंगली सूअर समूह में तेजी से कहीं जा रहे थे। गाइड ने बताया कि टाइगर और जंगली सूअर की लड़ाई लगभग एक से डेढ़ घंटे चलती है लेकिन विजय टाइगर की ही होती है ।
एक-एक वन क्षेत्र में टाईगरों ने अपने-अपने एरिया बांटे हुये हैं तथा कोई भी किसी के एरिया में अतिक्रमण नहीं करता है अन्यथा यह वर्चस्व की लड़ाई और युद्ध का आगाज होता है । खितौली ज़ोन टाइगर डी एम् और टाइग्रेस रा के लिए जाना जाता है । गाइड ने बताया कि कोर ज़ोन का ८०% भाग पशुओं के लिए आरक्षित है और केवल लगभग २०% हिस्सा पर्यटकों के लिए खुला हुआ है।
पिछले दो दिनों की यात्रा में हमें यह पता चल गया कि टाइगर के होने या आने पर हिरण किस तरह की आवाज में कॉल देते हैं। इसी कॉल के मिलने पर हम एक जगह सतर्क होकर टाइगर का इंतजार करने लगे । परन्तु काफी देर के इंतजार के बाद भी टाइगर ने बाहर मूव नहीं किया और निराशा हाथ लगी । जंगल में सभी लोग/ पर्यटक कॉल मिलने पर एक जगह आ जाते हैं, यह ड्राइवर एक दूसरे को जानकारी दे देते हैं । कुछ पत्थर के टीले ऐसे हैं जहां टाइगर दर्शन हो जाते हैं ।
गाइड ने बताया कि हम अब दराह बच्ची के एरिया में चलते हैं, शायद कुछ साईट हो जाए । रास्ते में हमें सांभर, जंगली मुर्गे, मेगपाई रॉबिन, अन्य पक्षियों के दर्शन हुए । उनका नैसर्गिक अंदाज आपका मन मोह लेगा। उसने समझाया कि आंवला, हरड़, बहेड़ा इन तीनों के पेड़ आपको आसपास मिलेंगे और इसी से त्रिफला का चूरन बनता है, इस तरह की प्रकृति की संरचना आपको प्रकृति की गोद में आकर ही पता चलेगी ।
सभी कोर ज़ोन के आसपास गाँव लगे हुए हैं, जहां जंगली जानवरों का खतरा बना रहता है । गाइड ने बताया कि पड़ोस के गाँव को भी कोर ज़ोन के लिए घोषित होने पर लोगों को हरजाना दिया जाएगा ताकि वह दूसरी जगह विस्थापित हो सकें ।
दूसरी तरफ एक अलार्म कॉल मिलने पर हमारे ड्राइवर दुर्गेश ने गाड़ी उसी तरफ दौड़ा दी। पता चला कि टाइगर का मूवमेंट है , हल्का कोहरा और पीछे से सूरज की रोशनी के बीच टाइगर की हलचल दिखाई दी और ओझल हो गया। लेकिन अगले ही लम्हे टाइगर अपनी मदमस्ती में चलता हुआ दिखाई दिया उसका साइज़ लगभग सात फुट होगा। उसके बाद वह पेड़ों मे ओझल हो गया। ऐसा लगा कि देवी माँ ने अपनी सवारी के दर्शन करा दिए । चूंकि वो हमें हमारी दाहिनी ओर दिखाई दिया था और हम बीच रास्ते में जीप में थे तो सभी लोग उसकी क्रॉसिंग का इंतजार कर रहे थे। पंद्रह मिनट बीत गए पता चला कि वह बहुत तेजी से क्रॉस कर बफर ज़ोन की तरफ चला गया। लगा कि जिस यात्रा के लिए निकले थे वह सम्पूर्ण हो गई। यह दृश्य अलौकिक एवं अविस्मरणीय था । गाइड का कहना था कि कोई नया टाइगर है अतः इसका नाम नहीं पता ।
हरेक कोर ज़ोन में पर्यटकों की सुविधा के लिए कुछ एरिया नाश्ते आदि के लिए रखा गया है । अभी हम वहाँ से आधे घंटे की दूरी पर थे। सभी की भूख प्यास का ध्यान रखते हुये ड्राइवर ने गाड़ी उस दिशा की तरफ बढ़ा दी । चारों ओर शांत और सुरम्य जंगल के वातावरण को कभी-कभी आती पक्षियों की चहचहाहट और दिलकश बना रही थी । थोड़ी देर बाद जीप हॉल्टिंग एरिया मे पहुँच गई, वहाँ पहले से ८/१० जीप विद्यमान थीं । तकरीबन छह सात स्टॉल थे जहां पर चाय, मैगी, गरमागरम पकोड़ी की व्यवस्था थी । रिज़ॉर्ट से लाएं पराँठों और सब्जी के साथ गरम चाय सुकून दे रही थी । नाश्ते में लाए सेंडविच, पराँठे ड्राइवर, गाइड, सहयात्री और सबके लिए पर्याप्त थे । कुछ ऐसे ही स्टॉल ताला ज़ोन में थे ।

ठण्ड भरी सुबह में चाय के साथ पकोड़ियों का खाना हमेशा आनंददायक और स्वादिष्ट लगता है , नाश्ते में मजा आ गया । सभी लोग फ्रेश होकर वापिस तरोताजा हो गए, लगभग १०-३० का समय था । मैंने एक स्टॉल वाले से पूछा कि कभी यहाँ टाइगर नहीं आते, आपको डर नहीं लगता । उसका कहना था कि नहीं, वो कुछ नहीं कहते हैं । यह एरिया बफर ज़ोन के काफी करीब था । मेरा मन सोच रहा था, “मानवीय मजबूरियों में बेखौफ जिंदगी“ ।
ब्रेक के बाद यात्रा का पुनः आरंभ हुआ। कोर ज़ोन में मिट्टी की सड़कें हैं और जहां मुलायम मिट्टी में जानवर अपने पदचिन्ह छोड़ जाते हैं । दुर्गेश का कहना था कि अब हम इन्हीं पगमार्क के सहारे टाइगर को ढूँढने की कोशिश करेंगे । अपने अनुभव के आधार पर यह लोग यह जान लेते हैं कि कौन से पगमार्क टाइगर के हैं ।
मानवीय इच्छाओं, आवश्यकताओं और शहरीकरण ने इन जीवों के लिए उनके एरिया को सीमित कर दिया है । घने एवं शान्त जंगलों में इन विलुप्त प्रजातियों को ढूँढना बड़ा सुकून भरा और रोमांचक है । साथ ही कुछ समय कुछ लम्हों के लिए यह आपको शहरों की भाग-दौड़ से कहीं दूर ले जाकर तरोताजा कर देते हैं ।
रास्ते में नए-नए पक्षी और उनके नए नए रंग-रूप बहुत ही लुभावने थे, जगह-जगह पानी के स्रोत पर शुष्क पेड़ों पर बैठे यह पक्षी उसकी सुंदरता को बढ़ा रहे थे । रास्ते में हमें सांभर भी मिले और बरकिंग डिअर भी । गाइड ने बताया कि हिरण अपने सींग साल में एक बार गिरा देते हैं और नए सींग आते हैं । पुराने सींगों में काफी केलशियम होता है और उसे साही आदि जानवर खाते हैं ।
सुबह सुबह की साईट के बाद अब साईट होना मुश्किल है । क्योंकि अधिकतर टाइगर पूरी रात चलते हैं अपने भोजन आदि की व्यवस्था करने के लिए और अब आराम करना पसंद करते हैं । दूसरा अभी मौसम ना बहुत गरम ना बहुत ठंडा इसलिए भी दर्शन थोड़े दुर्लभ हैं ।
फिर भी साइटिंग के लिए प्रयास जारी था और अब तालाब के पास कॉल की उम्मीद से इंतजार किया गया। सर्दियों की बजाय गर्मियों में टाइगर तालाब आदि में पानी पीने या चूंकि उन्हें गर्मी बहुत लगती है तो पानी के स्रोतों में लेटे रहना पसन्द करते हैं और आपको आसानी से साइटिंग हो जाती है। गाइड ने अप्रैल मई का समय अधिक उपयुक्त बताया ।
खितौली ज़ोन ताला ज़ोन के मुकाबले काफी समतल है । अब हम गेट की तरफ बढ़ रहे थे । ड्राइवर ने गाड़ी रोकी जहां एक लंबे पेड़ पर दो जंगली उल्लू बैठे हुये थे । वो इसी पेड़ पर रहते हैं और उनका साइज़ लगभग एक फुट से ज्यादा होगा ।
गेट पर गाइड को वापिस जाने की एंट्री करनी होती है । खितौली गेट से छोटी सड़क टिकट काउन्टर तक आती है। सड़क के एक ओर खितौली ज़ोन और दूसरी तरफ मगधी ज़ोन है । यह सड़क आगे उमरिया जाती है जोकि बाँधवगढ़ के और ज्यादा पास का रेलवे स्टेशन है। इस सड़क के दोनों तरफ आपको स्पॉटड डियर (चीतल) मिल जाएंगे । हो सकता है आने वाले समय में बाँधवगढ़ टिकट काउन्टर तक कोई बाइपास निकल जाए ताकि वन क्षेत्र को इन जीवों के लिए और अधिक क्षेत्र और सुरक्षा दी जा सके ।
यह यात्रा आपको प्रकृति से जोड़ने एवं प्राचीन काल और युग / अतीत में झाँकने का मौका देती है और साथ ही यह संदेश कि प्रकृति ने बिना पूछे इन जंगलों में सबके लिए व्यवस्था की है । इन्हीं जंगलों में हमारे पूर्वजों ने बाँधवगढ़ बसाया था जिसकी गलियों, पगडंडियों, जंगलों में आज हमने मिलकर झाँका ।
साथियो सबसे पहले वाले वृतांत/ संस्मरण / ब्लॉग (“नयाबास वाली गली”) में मात्राओं, वाक्यों, व्याकरण की गलतियाँ हुई हैं , मैँ अपने साथी एवं लेखक योगेंद्र आहूजा जी का शुक्रिया करता हूँ मार्गदर्शन करने के लिए। मैं पुनः कहूँगा कि मैं कोई लेखक नहीं हूँ , अतः आप इन्हें क्षमा करें और भाव पर जाएँ । दूसरा, मुझे लगता है कि जब भी आप अध्ययन और यात्रा के लिए निकलें आपके पास शांत चित्त और फुरसत होनी चाहिए तभी आप उस भाव को समझ पाएंगे और तभी आप उस यात्रा को महसूस कर पाएंगे और असली आनंद उठा पाएंगे । तीसरा, मैं पहले नवीन या ताजी यानि कुछ समय पहले की गलियों में, मोहल्लों में, पर्यटन स्थलों में जा रहा हूँ जिनकी स्मृति जेहन में ताजा है ।
चलिए दोस्तो आपको फिर ले चलूँगा बचपन, जवानी की कुछ जानी पहचानी, कुछ अनजानी, कुछ सुनसान गलियों में, मोहल्लों में, एक नए शहर, नए देहात, नए कस्बे, नए गाँव, नए पर्यटन स्थल के साथ। तब तक के लिए अलविदा, अभिवादन ।