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डलहौजी का सुभाष चौक (Travel Memoir of Dalhousie, khajihar, Dainkund and Taleru)

डलहौजी का सुभाष चौक (Travel Memoir of Dalhousie, khajihar, Dainkund and Taleru)

बैंकों में हॉलिडे होम की सुविधा मिल जाती थी अतः बहुत सारे कार्यक्रम / भ्रमण / पर्यटन इसी बहाने बन जाते थे । डलहौजी जाने का कार्यक्रम कई मर्तबा बना परंतु संभव नहीं हो पाया । इस बार भी ३१ मई से चार दिन के लिए हॉलिडे होम फिर बुक करा दिया । दिल्ली से डलहौजी आप बस के द्वारा भी जा सकते हैं – रोडवेज और वॉल्वो बस , जिसके लिए आप रात्रि यात्रा भी कर सकते हैं । दूसरा, दिल्ली से पठानकोट तक की यात्रा ट्रेन से भी की जा सकती हैं जोकि डलहौजी के लिए निकटतम रेलवे स्टेशन है, उसके बाद टेक्सी ली जा सकती है । तीसरा, दिल्ली से धर्मशाला (निकटतम एयरपोर्ट ) हवाई यात्रा करके भी आप डलहौजी पहुंच सकते हैं । गाज़ियाबाद से डलहौजी की दूरी काफी ज्यादा हैं परंतु लगा कि अपनी गाड़ी ही लेकर चलते हैं सुविधा रहेगी जो CNG की है ।

हापुड़ के एक ड्राइवर से बात की गई और चूंकि हम सुबह जल्दी निकलना चाहते थे क्योंकि यात्रा के लिए १२ घंटे के सफर का एक अंदाजा हम सोच रहे थे अतः हमने उसे सुबह लगभग ६ बजे निकलने की इच्छा व्यक्त की । उसने कहा , “मैं आपको डासना मिल जाऊंगा वहाँ से पेरिफेरल एक्सप्रेस वे पर चढ़कर सोनीपत होते हुये पठानकोट के लिए निकल जाएंगे “। हमने उसे हामी भर दी ।

यात्रा के ४/५ दिनों को ध्यान में रखते हुये पैकिंग शुरू कर दी गई । सबसे पहले पहाड़ों के मौसम को ध्यान में रखते हुये गरम कपड़े और स्वेटर, शाल, छतरी रखी गई, फिर कुछ दवाइयाँ जैसे पेट दर्द, सिर दर्द, वॉलीनी, विक्स आदि रख ली गईं ।

1 जून 2026 को हमने सुबह छह बजे गाड़ी से वसुंधरा से डासना के लिए प्रस्थान किया। वहाँ ड्राइवर ने गाड़ी संभाल ली और उसने  पेरिफरल पर गाड़ी चढ़ाकर सोनीपत की दिशा में बढ़ा दी । सुबह का नाश्ता मुरथल में मन्नत ढाबे पर किया गया । उसके बाद अंबाला और लुधियाना का रास्ता था, लुधियाना के बाद लंच के लिए गाड़ी रोकी, उसके बाद पठानकोट में लगा कि सफर ज्यादा हो गया है तो एक छोटा सा ब्रेक लेकर जूस, चाय आदि ले लिया जाए । उसके बाद थोड़ी चढ़ाई शुरू होती है और चूंकि चार बज गए थे अतः लग रहा था कि डलहौजी अंधेरे से पहले पहुँच जाएँ , क्योंकि ड्राइवर भी पहले कभी डलहौजी नहीं गया हुआ था । इस सफर का जो मेरा सबसे मनपसंद हमसफ़र था वो बिटिया का दिया हुआ सारेगामा का कारवां (गानों का रिकॉर्डर) – उसके पुराने सुरीले गीतों ने सफर का रोमांच बहुत बढ़ा दिया और रास्ता छोटा कर दिया ।

हम लगभग शाम सात बजे डलहौजी, सुभाष चौक पहुँच गए वहाँ से बाईं तरफ गली , जोकि वन वे है (लेकिन सड़क पर काम की वजह से अभी आना जाना दोनों एक ही तरफ से हो रहा था ) से होते हुये हम अपने होटल रावी व्यू पहुँच गए । होटल के पीछे की तरफ खुला एरिया है जहां टेबल कुर्सियाँ रखी हैं और वहाँ का व्यू बहुत प्यारा है ।

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1. होटल रावी व्यू डलहौजी से सूर्यास्त का नजारा 

 


होटल से हम थोड़ा टहलने निकल गए , सुभाष चौक हमारे होटल की दूसरी दिशा से लगभग मुश्किल से ४०० मीटर था , वहाँ अच्छी रौनक थी , कोने पर एक चाय वाले के पास खुले में बैठकर घर के पराँठों और आलू की सब्जी के साथ चाय पी , अदरक की देशी पकी हुई चाय पीकर बड़ा अच्छा लगा और थकान उतर गई , हालांकि सामने की तरफ पंजाबी रेस्टोरेंट में दूसरी चाय भी उपलब्ध है, उसने बताया कि वह सुबह ६.३० अपने गाँव से पैदल चल कर आता है । वापिस आकर हम विश्राम के लिए चले गए । होटल के रीसेप्शन पर लगे फोटो से अगले दिन की रूपरेखा बनाई ।

क्योंकि खजिहार जाना है यह तो निश्चित था पर उसके आगे का नहीं पता था , वहाँ पर बैठे लोगों से बातचीत कर सुबह का प्लान बन गया। 

 

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2. होटल रीसेप्शन से फोटोसहित जानकारी 

 


 

 

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3 . होटल रावी व्यू डलहौजी से सुबह का नजारा


 

2 जून 2026

सुबह उठ कर मैं सुभाष चौक निकल गया , रात जो चौक भीड़ भाड़ से गुलजार था , सुबह एकदम खाली , कुछ लंगूर मस्ती कर रहे थे और स्थानीय निवासी सुबह की मॉर्निंग वाक करते हुये एक दूसरे का अभिवादन कर रहे थे । चाय वाला अभी नहीं आया था। सुभाष चौक साईकिल के पहिये की तरह है साईकिल के पहिये की तीलियों की तरह , हर तरफ अलग अलग गलियां हैं । चाय का इरादा त्यागना पड़ा । वापिस होटल आ कर पीछे खुले एरिया से डलहौजी का नजारा बहुत खूबसूरत लग रहा था ।

 

सुबह ८ बजे के लगभग हम दोनों तैयार होकर पुनः सुभाष चौक नाश्ते की खोज में आ गए । हमें यात्रा में सबसे पहले कच्चे खाने की तलाश होती है । चौक से दाहिनी तरफ उतरते ही सीधे हाथ पर एक मिठाई की दुकान है जिस पर सुबह के नाश्ते के नाम पर पराँठे , पूरी और चने की रेशेदार सब्जी थी और चाय थी । चूंकि हम सबसे पहले ग्राहक थे तो सब कुछ ताजा , साफ सुथरा मिल गया । आलू का परांठा एवं दही और पूरी चने की सब्जी, चाय के साथ खाकर मजा आ गया ।

 

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4 .नाश्ते के लिए मिठाई की दुकान, सुभाष चौक , डलहौजी

सुभाष चौक से आप टैक्सी भी ले सकते हैं जोकि हर समय उपलब्ध हैं और अलग अलग दिशाओं और अलग अलग स्थानों के टूर कर सकते हैं ।

उसके बाद सुबह ही गाड़ी लेकर खजिहार के लिए निकल गए जिसे भारत का मिनी स्विट्जरलेन्ड कहा जाता है । डलहौजी से खजिहार का सफर जंगलो और वादियों में से निकलते हुये बहुत ही मनमोहक है, मदमस्त करती हुई हवायें , बड़े बड़े देवदार के पेड़, अपना मनपसंद सुरम्य संगीत , धूप छाँव की अठखेलियाँ , पक्षियों की चरचराहट, इन वादियों में खोने के लिए , अपने आप को छोड़ दीजिए । लगभग एक घंटे बाद हम खजिहार पहुँच गए जहां अच्छी खासी चहल पहल थी । गाड़ी को पार्किंग में लगाकर हम घूमने निकल गए, खजिहार जो अपने घास के मैदान (meadow) , बीच में पानी का छोटा ताल (wetland), चारों तरफ देवदार के बड़े पेड़ों के लिए मशहूर है , इतरा कर कहता है कि यूं ही नहीं उसे मिनी स्विट्जरलेन्ड कहते हैं । इसकी खूबसूरती को शब्दों में बयां करना मुश्किल  है और इसे देखकर आपको कश्मीर के गुलमर्ग की याद आ जाएगी । यहाँ पर आप घुड़सवारी का आनंद ले सकते हैं, फोटोग्राफी का आनंद ले सकते हैं ,पैराग्लाइडिंग कर सकते हैं , खाने के लिए हर तरह के रेस्तरां उपलब्ध हैं । हमने यहाँ पर चाय नाश्ते का आनंद लिया ।

 

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 9. खजिहार विडिओ 

 

 

फिर हम कालाटॉप के लिए निकल गए जिसके लिए आपको वापिस लक्कड़मंडी के लिए आना पड़ता है । यहाँ से कालाटॉप की दूरी लगभग तीन किलोमीटर की है , रास्ता थोड़ा खराब है , जहां आप टेक्सी ले सकते हैं , पैदल जा सकते हैं , अपनी गाड़ी से भी जा सकते हैं । हम यहाँ अपनी गाड़ी से ही गए थे, पर लग रहा था कि टेक्सी ले आते । कालाटॉप अपनी ओपन वन्यजीव अभयारण्य (wildlife sanctuary) के लिए प्रसिद्ध है । यहाँ फॉरेस्ट रेस्ट हाउस भी है (फोटो नीचे देखें ) और साथ में कॉटेज भी है जिन्हें आप ठहरने के लिए किराये पर ले सकते हैं । यहाँ हमें एक बुजुर्ग गाइड मिले जिन्होंने बताया कि भालू कितना खतरनाक और जानलेवा होता है । उन्होंने यहाँ पर कई जंगली जानवर देखे हैं । उतरने और चढ़ने के लिए रास्ते हैं , देवदार के पेड़ों के बीच यह शांत और खामोश वाक आपको जिंदगी भर याद रहेगी । सभी को भूख लग रही थी । यहीं पर एक तरफ स्थानीय लोग ताजा खाना बना रहे थे और साथ में मेगी , पकोड़ी , समोसे, मोमोज आदि बन रहे थे , बैठने की व्यवस्था हेतु टेबल , कुर्सियाँ जहां उनकी रसोई थी वहाँ पर भी थी और सीढ़ियाँ चढ़कर ऊपर खुले में भी थी । हमने दाल, चावल , राजमा , रोटी ऊपर बैठकर खाई आज भी उस सादे घरेलू खाने का स्वाद याद है । गेट पर एक दुकान स्थानीय सामानों की बिक्री के लिए भी है ।

 

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10.कालाटॉप का फॉरेस्ट रेस्ट हाउस

 

 

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11.कालाटॉप देवदार के पेड़ों के बीच

 

कालाटॉप से हम डेनकुंड पीक के लिए निकल गए , रास्ता घुमावदार और आँखों , दिल और मन को सुकून देने वाला, वहाँ पहुँच कर लंबी गाड़ियों की कतार देख कर ड्राइवर को बोल दिया कि हमें छोड़कर और गाड़ी को वापिस मोड़कर आगे लगा दे । एक तरफ ऊपर डेनकुंड पीक / पोहलाणी माता का मंदिर है और दूसरी तरफ एयर फोर्स पुलिस स्टेशन का रास्ता है जो आम जनता के लिए बंद है ।

 

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12.डैनकुंड की चढ़ाई शुरू करने का स्थान

 

चढ़ाई शुरू करते ही संशय हुआ कि हम चढ़ पाएंगे या नहीं , श्रीमती जी को चढ़ने पर सांस फूलने लगता है और मुझे लोअर बैक में दर्द हो जाता है । शुरू मे ही डंडियाँ नाममात्र किराये पर देने वाले मिल जाते हैं अतः हमने दो डंडिया ले लीं ताकि सफर आसान रहे । रास्ते में बुजुर्ग लोगों को देखर हिम्मत बंध गई । सफर की कुछ चढ़ाई करने के बाद जो नजारा आपको मिलता है वो आपको भौंचक्का कर देगा , आप हैरान रह जाएंगे , छोटे छोटे जंगली फूलों से लदी हरिभरी खूबसूरत वादियाँ जैसे आसमान में तारों की बारात हो और उनके बीच से थोड़ा सा ऊंचा नीचा , घुमावदार रास्ता, नीला खामोश दूर तक फैला हुआ आकाश, असीम, अनंत, खामोश, पहाड़ों पर उड़ते हुये बादल जो आपको और जिन्हें आप छूने को बेताब, मंद मंद हवा में आप, प्रकृति और उस अदृश्य शक्ति की नजदीकियाँ , हाँ खजिहार की खूबसूरती अलग है लेकिन इस ट्रेक पर चलकर जो आनंद, जो रोमांच, जो सुकून आपको मिलेगा उसको आप जिंदगी भर नहीं भूल पाएंगे, आपको लगेगा कि यह कौनसे गगन या जहान की खुली यात्रा है। शहरों में तो आकाश भी बिल्डिंगों के बीच कहीं खो गया है ।

 

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13. डैनकुंड से नीचे का विहंगम दृश्य 
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14. डैनकुंड की ट्रेकिंग 
 

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15. डैनकुंड बादलों के बीच का व्यू 
 

ट्रेक और यात्रा का समापन पोहलाणी माता के मंदिर दर्शन पर होता है बिना छत का खुला मंदिर , जोकि माँ काली का ही स्वरूप है , शहरों में मंदिरों की बंद चार दीवारियों से निकलकर जब आप खुले में  ब्रह्म के सामने दो मिनट बैठेंगे तो कुछ अलौकिक होगा जो आपको छू कर जाएगा । तत्पश्चात,  लंगर में प्रसाद लिया और वहीं एक दुकान पर चाय पी और कुत्तों और कव्वों को बिस्किट खिलाए । लौटते में  शाम ढलने वाली हो रही थी , चरवाहे ( महिलायें भी ) अपनी बकरियों, भेड़ों, भैंसों को वापिस हांक रहे थे । इतनी ऊंची चढ़ाई उनकी रोजाना की आदत थी । नीचे उतरकर धन्यवाद के साथ डंडे वापिस कर , हम गाड़ी की तरफ आ गए , नीचे चाय, मेगी आदि के स्टॉल थे ।

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16. पोहलाणी माता का मंदिर 
 

डलहौजी होटल में विश्राम कर हम गांधी चौक की तरफ निकल गए जोकि होटल से लगभग २ किलोमीटर के करीब होगा, डलहौजी अंग्रेजों के द्वारा बसाया हुआ शहर है यह जब आप होटल से गांधी चौक के लिए पैदल चलेंगे तो आपको पता चल जाएगा , जगह जगह किनारे पर लोहे के नक्काशी वाले शेड, उनके अंदर नक्काशी वाली बहुत पुरानी लोहे की लंबी आरामदायक कुर्सियाँ, पुराने जमाने के लोहे के लैम्प शैड, ताकि आप इनमें बैठकर पहाड़ों की शांति और उन नजारों को महसूस कर सकें । एक एहसास - ठहराव, थोड़ी थोड़ी दूरी पर ठहराव, फुरसत के लमहें । मुझे लगता है कि हिल स्टेशन को बसाने में जहां उनकी सड़कें , घर, होटल, बिजली अहम हैं उससे भी कहीं ज्यादा यह जगह जगह पर बनाए गए विश्राम स्पॉटस या ठहराव हैं । यह आज भी संदेश दे रहे हैं कि इस भागदौड़ और कशमकश भरी जिंदगी में अगर हम थोड़ी थोड़ी दूरी के बाद एक ठहराव/ विश्राम ले लें तो शायद जिंदगी आसान और ऊर्जा से भरी हुई हो जाएगी । गांधी चौक पर ही डलहौजी का माल रॉड है जो थोड़ा तंग है , जहां आपको  खरीदारी, खाने पीने का सामान मिल जाएगा । लौटते हुये गांधी चौक पर ही शुद्ध शाकाहारी शर्मा भोजनालय पर खाना खाया ।होटल आकार रीसेप्शन पर लगा फोटो देखकर अगले दिन की रूपरेखा बनाई ।

3 जून 2026

सुबह वापिस सुभाष चौक आकार अपने पसंदीदा शाकाहारी नाश्ते के लिए डलहौजी स्वीट्स पर आ गए , उसके ठीक सामने एक फल और सब्जी वाले की दुकान है । इस बार हम निकल गए तलेरू बोटिंग पॉइंट पर , रास्ते में पहले चमेरा बांध (डेम) आया , उसके बाद चमेरा झील आई , इसी झील पर तलेरू बोटिंग पॉइंट है । यहाँ कई छोटे छोटे स्टाल / दुकानें हैं जो स्थानीय निवासी चलाते हैं , हमने एक जगह फलों की चाट खाई । यह एक शांत , रमणीय जगह है जहां कई तरह की बोटिंग उपलब्ध है और जिनके रेट अलग अलग हैं । सामूहिक रूप में जाने पर ५०० रुपये प्रति सवारी है । हरे रंग का झील का पानी आपको बोटिंग में हरा भरा सुकून देगा ।

 

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17. और 18. तलेरू बोटिंग पॉइंट स्वागत एण्ड स्टार्टिंग पॉइंट 

 

 

वहाँ से थोड़ी सी दूर लगभग ७ किलोमीटर भलेई माता का मंदिर है जो माँ भद्रकाली को समर्पित है , माँ भद्रकाली का मुख्य शक्ति पीठ कुरुक्षेत्र में है , थोड़ी सी सीढ़ियाँ चड़कर मंदिर का प्रांगण है , आप श्रद्धा से वहाँ पूजा अर्चना कर सकते हैं  ।

लौटते समय , झील के किनारे किनारे का खूबसूरत सफर, जैसे कह रही हो कि मुझे भी साथ ले चलो और आपका भी मन करेगा कि सफर के अन्त तक यह साथ ही रहे,  दूसरी तरफ झील के आस पास की बस्तियां जो कह रही हों ठहर जाओ, यहीं रुक जाओ , यही पशोपेश । हम चार बजे तक होटल आ गए ।

 

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19.चमेरा झील का सफर – वापसी में  

 

विश्राम करने के उपरान्त हम सुभाष चौक आ गए जहां पर बहुत पुराना सेंट फ्रांसिस चर्च है, चारों तरफ देवदार के पेड़ हैं जो उसके शांत वातावरण को और गहरी खामोशी मे तब्दील कर देते हैं , चर्च में  जाकर आपको सुकून महसूस होगा । रात्रि का खाना  पुनः हमने गांधी चौक पर खाया जहां कई शाकाहारी भोजनालय हैं । होटल आ कर हमने सुबह की पेकिंग शुरू की क्योंकि मन हुआ कि हम यहाँ तक आए है तो अमृतसर मत्था टेक कर चलते हैं । जून के महीने में भी डलहौजी मसूरी, नैनीताल, ऋषिकेश, जैसी भीड़ लिए हुये नहीं था जिससे हम वहाँ की शांति को अनुभव कर पाए ।

 

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20. चर्च का फोटो 

 

जब ऐसी किसी यात्रा का सुयोग होता है तो मुझे धर्मवीर भारती की किताब “ ठेले पर हिमालय “ का एक पेराग्राफ याद आ जाता है ।

“ 21 नवम्बर , 1956

जब आप जिंदगी के भीड़ भाड़ वाले राजमार्ग पर थके हारे , भीड़ की लहरों में धक्के खाते हुए , विवश आगे ढकेलते जा रहे हों और आपको अकस्मात एक छोटी पगडंडी रास्ते से फूटती दिखाई दे, जो परिचित हरीतिमा को गुदगुदाती हुई किसी अपरिचित ठिकाने को जा रही हो, तो मैं आप से आग्रह करता हूँ कि बिना कुछ भी सोचे समझे , जल्दी से, तमाम जरूरी से जरूरी काम छोड़कर उस पगडंडी पर मुड़ जाइए । कभी कभी थोड़ा पलायन बहुत स्वस्थ होता है । “

लगभग 70 साल बाद भी हम उसी भाग दौड़ भरी जिंदगी से फुरसत के कुछ लम्हे चुराना चाहते हैं , एक अलग सी स्फूर्ति , एक अलग सी ताजगी , एक अलग से उत्साह के लिए , शायद यही मानव स्वभाव है और इसीलिए आज भी उपरोक्त कथन कितना सार्थक प्रतीत होता है ।

चलिए दोस्तों , अगले सफर में मैं आपको ले चलूँगा अमृतसर की गलियों में , तब तक के लिए अलविदा, अभिवादन । मैं अपने अनुभवी साथी और बड़े भाई सदृश श्री हर्षवर्धन जोग जी का , जो काफी अनुभवी ब्लॉगर है , मार्गदर्शन एवं उत्साह बढ़ाने हेतु धन्यवाद देता हूँ ।


 

गलियारा लेखक

गलियारा लेखक

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